शाम की रंगीनियाँ बाद-ए-सबा तक ले गया
ज़ख्म देकर बेवफाई का दवा तक ले गया
ख़्वाब देखे थे हजारों मंजिलों के वास्ते
मंजिलें तो छोड़िए वो रास्ता तक ले गया
क्या बताऊँ इश्क़ के खाते का ये नुकसान मैं
ब्याज को तो छोड़ ही दो वो जमा तक ले गया
झूठ के रहम-ओ-करम पर पल रहे सब आजकल
सच ज़माने को महज दाम-ए-फ़ना तक ले गया
प्रेम राधा और सीता का अगर था त्याग तो
प्रेम मीरा का इसे फिर साधना तक ले गया
कौन सच्चा कौन झूठा बात जब इस पर हुई
सिलसिला ये हर दफ़ा चून-ओ-चरा तक ले गया
हुक्मरानों के यहाँ बिकते रहे ईमाँ तभी
मुफलिसों को वक़्त ये आह-ओ-बुका तक ले गया
स्वरचित/मौलिक
योगेश बहुगुणा 'योगी'
बाद-ए-सबा - सुबह की ठंडी हवा
दाम-ए-फ़ना - मौत का फंदा
चून-ओ-चरा - बहस, वाद-विवाद
आह-ओ-बुका - रोना, विलाप करना
